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Sunday, 24 September 2017

तेरी बुराइयो को हर अखबार कहता है

*तेरी बुराइयों* को हर *अख़बार* कहता है,
और तू मेरे *गांव* को *गँवार* कहता है   //
*ऐ शहर* मुझे तेरी *औक़ात* पता है  //
तू *चुल्लू भर पानी* को भी *वाटर पार्क* कहता है  //
*थक*  गया है हर *शख़्स* काम करते करते  //
तू इसे *अमीरी* का *बाज़ार* कहता है।
*गांव*  चलो *वक्त ही वक्त*  है सबके पास  !!
तेरी सारी *फ़ुर्सत* तेरा *इतवार* कहता है //
*मौन*  होकर *फोन* पर *रिश्ते* निभाए जा रहे हैं  //
तू इस *मशीनी दौर*  को *परिवार* कहता है //
जिनकी *सेवा* में *खपा*  देते थे जीवन सारा,
तू उन *माँ बाप*  को अब *भार* कहता है  //
*वो* मिलने आते थे तो *कलेजा* साथ लाते थे,
तू *दस्तूर*  निभाने को *रिश्तेदार* कहता है //
बड़े-बड़े *मसले* हल करती थी *पंचायतें* //
तु  अंधी *भ्रष्ट दलीलों* को *दरबार*  कहता है //
बैठ जाते थे *अपने पराये* सब *बैलगाडी* में  //
पूरा *परिवार*  भी न बैठ पाये उसे तू *कार* कहता है  //
अब *बच्चे* भी *बड़ों* का *अदब* भूल बैठे हैं //
तू इस *नये दौर*  को *संस्कार* कहता है  *.//*
✍✍✍✍✍✍✍✍✍
        *मेहरबान अंसारी*


Saturday, 10 June 2017

मौत से हमेशा डरना चाईये

डरता हुँ मौत से मगर मरना ज़रूरी है ।

लरज़ता हुँ कफन से मगर पहन्ना ज़रूरी है ।

हो जाता हुँ गमग़ीन जनाज़े को देख कर ।

लेकिन मेरा जनाज़ा भी उठना ज़रूरी है ।

होती बड़ी कपकपी कबरों को देख कर
पर मुद्दतो इस कबर में रहना ज़रूरी है ।

मौत के आगोश में जिस दिन हमे सोना होगा ।

ना कोइ तकिया ना कोइ बिछोना होगा ।

साथ होंगे हमारे अमाल और कब्रिस्‍तान का छोटा सा
कोना होगा ।

मत करना कभी गुरूर अपने आप पर
ऐ इन्सान ।

अल्लाह ने तेरे जैसे ना जाने कितने मिट्टी से बना कर ।

मिट्टी में मिला दिए ।

अल्लाह हर गुनाहों की माफी माँगने पर माफ कर देता है सिवाय गीबत और चुगली पर
अल्लाह तब तक माफ नही फरमाता जब तक इन्सान
खुद उस से माफी ना माँगे जिस की गीबत की है ।

ये एक ऐसा गुनाह है जिसकी वजह से लोग काट काट
कर
जहन्नम में फैंके जाऐगें

📝मेहरबान अंसारी

Saturday, 28 January 2017

Maharban Ansari kairana

दोनों आलम में तेरे हुकुम को चलते देखा
बिन तेरे हुकुम के पत्ता भी हिलता ना देखा
बदला दुनिया का चलन और हर एक से बदली
हमने कुरऑन को अब तक ना  बदलते देखा
कौन कहता है कि दुश्मन जीने नहीं देता
गोद फिरौन की और मूसा को पलते  हुए देखा
ए उमर आप तो क्या है हमारे नबी के आगे
अच्छे-अच्छों को इरादों को बदलते देखा
सरकारे मदीना ने जिन को किया है रोशन
उन चरागों को हवा में भी जलते देखा
क्या अजब शान अल्लाह अली की देखो
डूबे सूरज को इशारों पर पलटते हुए देखा
लाख चाहा सद्दाद ने कजा से बचना
पर सितम वक्ते  कजा हमने न टलते देखा
Maharban Ansari 8791477582