Friday, 9 June 2017

सद्दाम ने अपने 26 लीटर ख़ून से लिखवाई थी कुरान'

सद्दाम ने अपने 26 लीटर ख़ून से लिखवाई थी कुरान'

रेहान फ़ज़लबीबीसी संवाददाता

इमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES/AFP

सद्दाम हुसैन को बड़े-बड़े महल बनाने के अलावा बड़ी-बड़ी मस्जिदें बनवाने का भी शौक था. एक इसी तरह की मस्जिद उन्होंने मध्य बग़दाद में बनवाई थी जिसे ' उम्म अल मारीक' नाम दिया गया था.

इसको ख़ास तौर से 2001 में सद्दाम हुसैन की सालगिरह के लिए बनवाया गया था. ख़ास बात ये थी कि इसकी मीनारें स्कड मिसाइल की शक्ल की थीं.

ये वही मिसाइलें थीं जिन्हें सद्दाम हुसैन ने खाड़ी युद्ध के दौरान इसराइल पर दग़वाया था.

सद्दाम हुसैन का महल देखना चाहेंगे?

सद्दाम और गद्दाफ़ी ज़िंदा होते तो अच्छा होताः ट्रम्प

इमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES

'ऑपरेशन डेसर्ट स्टॉर्म' जो 43 दिनों तक चला था, की याद दिलाने के लिए इन मीनारों की ऊँचाई 43 मीटर रखी गई थी.

सद्दाम हुसैन की जीवनी लिखने वाले कॉन कफ़लिन लिखते हैं, "सद्दाम की बनवाई एक मस्जिद में सद्दाम के ख़ून से लिखी गई एक कुरान रखी हुई है.

सीआईए एजेंट जिसने असली सद्दाम को पहचाना

सद्दाम हुसैन: 'क्रांतिकारी' बन गया था 'तानाशाह'

उसके सभी 605 पन्नों को लोगों को दिखाने के लिए एक शीशे के केस में रखा गया है. मस्जिद के मौलवी का कहना है कि इसके लिए सद्दाम ने तीन सालों तक अपना 26 लीटर ख़ून दिया था."

इमेज कॉपीरइटGETTY IMAGESImage captionसद्दाम हुसैन के 20 महलों में से एक अल-फ़ॉ

सद्दाम पर एक और किताब, 'सद्दाम हुसैन, द पॉलिटिक्स ऑफ़ रिवेंज' लिखने वाले सैद अबूरिश का मानना है कि सद्दाम की बड़ी-बड़ी इमारतें और मस्जिदें बनाने की वजह तिकरित में बिताया उनका बचपन था, जहाँ उनके परिवार के लिए उनके लिए एक जूता तक ख़रीदने के लिए भी पैसे नहीं होते थे.

दिलचस्प बात ये है कि सद्दाम अपने जिस भी महल में सोते थे, उन्हें सिर्फ़ कुछ घंटों की ही नींद लेनी होती थी. वो अक्सर सुबह तीन बजे तैरने के लिए उठ जाया करते थे.

इराक़ जैसे रेगिस्तानी मुल्क में पहले पानी धन और ताक़त का प्रतीक हुआ करता था और आज भी है.

इमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES

इसलिए सद्दाम के हर महल में फव्वारों और स्वीमिंग पूल की भरमार रहती थी. कफ़लिन लिखते हैं कि सद्दाम को स्लिप डिस्क की बीमारी थी. उनके डाक्टरों ने उन्हें सलाह दी थी कि इसका सबसे अच्छा इलाज है कि वो खूब चहलकदमी और तैराकी करें.

सद्दाम हुसैन के सारे स्वीमिंग पूलों की बहुत बारीकी से देखभाल की जाती थी. उनका तापमान नियंत्रित किया जाता था और ये भी सुनिश्चित किया जाता था कि पानी में ज़हर तो नहीं मिला दिया गया है.

इमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES

सद्दाम पर एक और किताब लिखने वाले अमाज़िया बरम लिखते हैं, "ये देखते हुए कि सद्दाम के शासन के कई दुश्मनों को थेलियम के ज़हर से मारा गया था, सद्दाम को अंदर ही अंदर इस बात का डर सताता था कि कहीं उन्हें भी कोई ज़हर दे कर न मार दे. हफ़्ते में दो बार उनके बग़दाद के महल में ताज़ी मछली, केकड़े, झींगे और बकरे और मुर्गे के गोश्त की खेप भिजवाई जाती थी."

वो आगे लिखते हैं, "राष्ट्पति के महल में जाने से पहले परमाणु वैज्ञानिक उनका परीक्षण कर इस बात की जाँच करते थे कि कहीं इनमें रेडियेशन या ज़हर तो नहीं है.''

इमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES

किताब में लिखा है, ''सद्दाम के महलों की संख्या 20 के करीब थी. उनमें कर्मचारी हर समय मौजूद रहते थे और सभी महलों में तीन वक्त का खाना बना करता था, चाहे उनमें सद्दाम रह रहे हों या नहीं."

सद्दाम की कमज़ोरी थी कि वो हमेशा बहुत अच्छा दिखना चाहते थे. इसलिए बाद में उन्होंने परंपरागत ज़ैतूनी रंग की सैनिक वर्दी पहनना छोड़ कर सूट पहनना शुरू कर दिया था.

ऐसा उन्होंने तत्कालीन संयुक्त राष्ट्र महासचिव कोफ़ी अन्नान की सलाह पर किया था जिनका मानना था कि सूट पहनने से विश्व नेता के रूप में उनकी छवि बेहतर होगी.

इमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES

सद्दाम हमेशा अपने बालों में ख़िज़ाब लगाते थे और लोगों के सामने पढ़ने वाला चश्मा लगा कर कभी सामने नहीं आते थे. जब वो भाषण देते थे तो उनके सामने कागज़ पर बड़े बड़े शब्द लिखे होते थे- एक पन्ने पर सिर्फ़ दो या तीन लाइनें.

सद्दाम इस बाद का भी ख़्याल रखते थे कि चलते समय कुछ कदमों से ज़्यादा उनकी फ़िल्म न उतारी जाए.

इमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES

कॉन कफ़लिन लिखते हैं कि 'सद्दाम दिन में कई बार छोटी छोटी झपकियाँ ले लिया करते थे. कई बार तो ऐसा होता था कि वो बीच बैठक से उठ कर बगल वाले कमरे में चले जाते थे और एक छोटी नींद ले कर आधे घंटे बाद तरोताज़ा निकलते थे.'

सद्दाम को टेलीविज़न देखने का भी शौक था और वो ज़्यादातर सीएनएन, बीबीसी और अलजज़ीरा देखा करते थे.

उन्हें रोमांचक अंग्रेज़ी थ्रिलर्स देखने का भी शौक था और अंग्रेज़ी फ़िल्म 'द डे ऑफ़ द जैकाल' उनकी पसंदीदा फ़िल्म थी.

इमेज कॉपीरइटGETTY IMAGESImage captionमंत्रिमंडल की बैठक लेते हुए सद्दाम हुसैन

सन 2002 का शुरुआत में सद्दाम ने कैबिनेट बैठक के दौरान अपने एक मंत्री को अपनी घड़ी देखते हुए देख लिया.

जब बैठक समाप्त हो गई तो उन्होंने उस मंत्री को रुकने के लिए कहा. उन्होंने उनसे पूछा, 'क्या आपको बहुत जल्दी है?'

जब उस मंत्री ने कहा कि ऐसी बात नहीं है तो सद्दाम ने उन्हें डांटते हुए कहा कि ऐसा कर आपने मेरा अपमान किया है.

कफ़लिन लिखते हैं, "सद्दाम ने आदेश दिया कि उन मंत्री को उसी कमरे में दो दिनों तक कैद रखा जाए. वो मंत्री बैठक कक्ष में दो दिनों तक कैद रहा और उसे लगता रहा कि उसे कभी भी बाहर ले जाकर गोली मारी जा सकती है. आखिर में सद्दाम ने उनके प्राण तो बख्श दिए लेकिन उन्हें अपने पद से हाथ धोना पड़ा."

इमेज कॉपीरइटGETTY IMAGESImage captionसद्दाम हुसैन पत्नी साजिदा और अपने बच्चों के साथ

सद्दाम के लिए उनके विरोधियों से ज़्यादा उनका खुद का परिवार परेशानी का कारण था और उसमें बहुत बड़ी भूमिका थी उनकी अपनी पत्नी साजिदा के प्रति बेवफ़ाई की.

1988 के आसपास सद्दाम को बहुत बड़े पारिवारिक संकट से गुज़रना पड़ा जब उनके इराकी एयरवेज़ के महानिदेशक की पत्नी समीरा शाहबंदर से संबंध हो गए.

समीरा लंबी थी, हसीन थीं और उनके सुनहरे रंग के बाल भी थे और सबसे बड़ी बात ये थी कि वो शादीशुदा थीं.

इमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES

सैद अबूरिश लिखते हैं, "कई सालों तक राष्ट्रपति महल में काम करने वाले एक अधिकारी ने मुझे बताया था कि सद्दाम को शादीशुदा औरतों से संबंध बनाना ख़ासतौर से पसंद था. ये उनके पतियों को ज़लील करने का उनका अपना तरीका हुआ करता था."

सद्दाम की इस तरह की रंगरेलियों का इंतेज़ाम उनका अंगरक्षक कामेल हना जेनजेन किया करता था.

जेनजेन बीस सालों तक सद्दाम का निजी अंगरक्षक था. दिलचस्प बात ये थी कि जेनजेन सद्दाम के रसोइए का बेटा था.

इमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES

उसके बहुत सारे कामों में एक काम सद्दाम को दिए जाने वाले भोजन को खा कर देखना भी था कि उसमें कहीं ज़हर तो नहीं मिलाया गया था.

सद्दाम का मानना था कि उनका रसोइया उनके खाने में इसलिए कभी ज़हर नहीं मिलाएगा क्योंकि उसके खुद के बेटे को उसे पहले चखना होता था.

सद्दाम को फांसी दिए जाने पर रोए थे अमरीकी सैनिक

सद्दाम को फांसी दिए जाने पर रोए थे अमरीकी सैनिक

इमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES

सद्दाम हुसैन की सुरक्षा में लगाए गए बारह अमरीकी सैनिक उनकी पूरी ज़िंदगी के बेहतरीन मित्र न सही, लेकिन उनके आख़िरी मित्र ज़रूर थे.

सद्दाम के आख़िरी क्षणों तक साथ रहे 551 मिलिट्री पुलिस कंपनी से चुने गये इन सैनिकों को 'सुपर ट्वेल्व' कह कर पुकारा जाता था.

इनमें से एक विल बार्डेनवर्पर ने एक किताब लिखी है, 'द प्रिज़नर इन हिज़ पैलेस, हिज़ अमैरिकनगार्ड्स, एंड व्हाट हिस्ट्री लेफ़्ट अनसेड' जिसमें उन्होंने सद्दाम की सुरक्षा करते हुए उनके अंतिम दिनों के विवरण को साझा किया है.

विज्ञापन

एजेंट जिसने असली सद्दाम को पहचानासद्दाम हुसैन- 'क्रांतिकारी' बन गया था 'तानाशाह'सद्दाम हुसैन को हटाना सही- ब्लेयरइमेज कॉपीरइटGETTY IMAGESImage captionविल बार्डेनवर्पर, जो सद्दाम हुसैन की सुरक्षा में रखे गए 'सुपर ट्वेल्व' अमरीकी सैनिकों की टीम का हिस्सा थे.

बार्डेनवर्पर मानते हैं कि जब उन्होंने सद्दाम को उन लोगों के हवाले किया जो उन्हें फांसी देने वाले थे, तो सद्दाम की सुरक्षा में लगे सभी सैनिकों की आँखों में आँसू थे.

'दादा की तरह दिखते थे सद्दाम'

बार्डेनवर्पर अपने एक साथी एडम रोजरसन के हवाले से लिखते हैं कि, 'हमने सद्दाम को एक मनोविकृत हत्यारे के रूप में कभी नहीं देखा. हमें तो वो अपने दादा की तरह दिखाई देते थे.'

सद्दाम पर अपने 148 विरोधियों की हत्या का आदेश देने के लिए मुक़दमा चलाया गया था.

इमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES

उन्होंने इराकी जेल में अपने अंतिम दिन अमरीकी गायिका मेरी जे ब्लाइज़ा के गानों को सुनते हुए बिताए. वो अपनी खचाड़ा एक्सरसाइज़ बाइक पर बैठना पसंद करते थे, जिसे वो 'पोनी' कह कर पुकारा करते थे.

उनको मीठा खाने का बहुत शौक था और वो हमेशा मफ़िन खाने के लिए आतुर रहते थे.

बार्डेनवर्पर लिखते हैं कि अपने अंतिम दिनों में सद्दाम का उन लोगों के प्रति व्यवहार बहुत विनम्र था और वो ये आभास कतई नहीं होने देते थे कि वो अपने ज़माने में बहुत क्रूर शासक हुआ करते थे.

कास्त्रो ने सिगार पीना सिखाया

सद्दाम को 'कोहिबा' सिगार पीने का शौक था, जिन्हें वो गीले वाइप्स के डिब्बे में रखा करते थे. वो बताया करते थे कि सालों पहले फ़िदेल कास्त्रो ने उन्हें सिगार पीना सिखाया था.

इमेज कॉपीरइटAFPImage captionफ़िदेल कास्त्रो और सद्दाम हुसैन

बार्डेनवर्पर ने वर्णन किया है कि सद्दाम को बागबानी का बहुत शौक था और वो जेल परिसर में उगी बेतरतीब झाड़ियों तक को एक सुंदर फूल की तरह मानते थे.

सद्दाम अपने खाने के बारे में बहुत संवेदनशील हुआ करते थे.

वो अपना नाश्ता टुकड़ो में किया करते थे. पहले ऑमलेट, फिर मफ़िन और इसके बाद ताज़े फल. अगर गलती से उनका ऑमलेट टूट जाए, तो वो उसे खाने से इंकार कर देते थे.

बार्डेनवर्पर याद करते हैं कि एक बार सद्दाम ने अपने बेटे उदय की क्रूरता का एक वीभत्स किस्सा सुनाया था जिसकी वजह से सद्दाम आगबबूला हो गए थे.

इमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES

हुआ ये था कि उदय ने एक पार्टी में गोली चला दी थी, जिसकी वजह से कई लोग मारे गए थे और कई घायल हो गए थे.

इस पर सद्दाम इतने नाराज़ हुए थे कि उन्होंने हुक्म दिया कि उदय की सारी कारों में आग लगा दी जाए.

सद्दाम ने ठहाका लगाते हुए ख़ुद बताया कि किस तरह उन्होंने उदय की मंहगी रॉल्स रॉयस, फ़रारी और पोर्श कारों के संग्रह में आग लगवा दी थी और उससे उठी लपटों को निहारते रहे थे.

दिलफेंक सद्दाम

सद्दाम की सुरक्षा में लगे एक अमरीकी सैनिक ने उनको बताया था कि उसके भाई की मौत हो गई है. यह सुनकर सद्दाम ने उसे गले लगाते हुए कहा था, 'आज से तुम मुझे अपना भाई समझो.'

सद्दाम ने एक और सैनिक से कहा था कि अगर मुझे मेरे धन का इस्तेमाल करने की अनुमति मिल जाए, तो मैं तुम्हारे बेटे की कालेज की शिक्षा का ख़र्चा उठाने के लिए तैयार हूँ.

इमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES

एक रात सब ने बीस साल के सैनिक डॉसन को एक ख़राब नाप के सूट में घूमते हुए देखा. पता चला कि डॉसन को सद्दाम ने अपना वो सूट तोहफ़े में दिया है.

बार्डेनवर्पर लिखते हैं कि, 'कई दिनों तक हम डॉसन पर हंसते रहे, क्योंकि वो उस सूट को पहन कर इस तरह चला करता था, जैसे वो किसी फ़ैशन शो की 'कैटवॉक' में चल रहा हो.'

सद्दाम और उनकी सरक्षा में लगे गार्डों के बीच दोस्ती पनपती चली गई, हालांकि उन्हें साफ़ आदेश थे कि सद्दाम के नज़दीक आने की बिल्कुल भी कोशिश न की जाए.

हुसैन को उनके मुक़दमे के दौरान दो जेलों में रखा गया था.

इमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES

एक तो बग़दाद में अंतर्राष्ट्रीय ट्राइब्यूनल का तहख़ाना था और दूसरा उत्तरी बग़दाद में उनका एक महल था जो कि एक द्वीप पर था, जिस पर एक पुल के ज़रिए ही पहुंचा जा सकता था.

बार्डेनवर्पर लिखते हैं, 'हमने सद्दाम को उससे ज़्यादा कुछ नहीं दिया जिसके कि वो हक़दार थे. लेकिन हमने उनकी गरिमा को कभी आहत नहीं किया.'

स्टीव हचिंसन, क्रिस टास्कर और दूसरे गार्डों ने एक स्टोर रूम को सद्दाम के दफ़्तर का रूप देने की कोशिश की थी.

'सद्दाम का दरबार' बनाने की कोशिश

सद्दाम को 'सरप्राइज़' देने की योजना बनाई गई. पुराने कबाड़ ख़ाने से एक छोटी मेज़ और चमड़े के कवर की कुर्सी निकाली गई और मेज़ के ऊपर इराक का एक छोटा सा झंडा लगाया गया.

इमेज कॉपीरइटGETTY IMAGESImage captionसद्दाम हुसैन को अमरीकी सैनिकों ने एक बंकर से गिरफ़्तार किया था.

बार्डेनवर्पर लिखते हैं, 'इस सबके पीछे विचार ये था कि हम जेल में भी सद्दाम के लिए एक शासनाध्यक्ष के दफ़्तर जैसा माहौल पैदा करने की कोशिश कर रहे थे. जैसे ही सद्दाम उस कमरे में पहली बार घुसे, एक सैनिक ने लपक कर मेज़ पर जम आई धूल को झाड़न से साफ़ करने की कोशिश की.'

सद्दाम ने इस 'जेस्चर' को नोट किया और वो कुर्सी पर बैठते हुए ज़ोर से मुस्कराए.

इमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES

सद्दाम रोज़ उस कुर्सी पर आकर बैठते और उनकी सुरक्षा में लगाए गए सैनिक उनके सामने रखी कुर्सियों पर बैठ जाते. माहौल ये बनाया जाता जैसे सद्दाम अपना दरबार लगा रहे हों.

बार्डेनवर्पर बताते हैं कि सैनिकों की पूरी कोशिश होती थी कि सद्दाम को खुश रखा जाए. बदले में सद्दाम भी उनके साथ हंसी मज़ाक करते और वातावरण को ख़ुशनुमा बनाए रखते.

कई सैनिकों ने बाद में बार्डेनवर्पर को बताया कि उन्हें पूरा विश्वास था कि 'अगर उनके साथ कुछ बुरा हुआ होता, तो सद्दाम उन्हें बचाने के लिए अपनी जान की बाज़ी लगा देते.'

सद्दाम को जब भी मौका मिलता, वो अपनी रक्षा कर रहे सैनिकों से उनके परिवार वालों का हालचाल पूछते.

इमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES

इस किताब में सबसे चकित कर देने वाला किस्सा वो है जहाँ ये बताया गया है कि सद्दाम के मरने पर इन सैनिकों ने बाक़ायदा शोक मनाया था, जबकि वो अमरीका के कट्टर दुश्मन माने जाते थे.

उन सैनिकों में से एक एडम रौजरसन ने विल बार्डेनवर्पर को बताया कि 'सद्दाम को फांसी दिए जाने के बाद हमें लगा कि हमने उनके साथ ग़द्दारी की है. हम अपने आप को उनका हत्यारा समझ रहे थे. हमें ऐसा लगा कि हमने एक ऐसे शख़्स को मार दिया जो हमारे बहुत नज़दीक था.'

सद्दाम को फांसी दिए जाने के बाद जब उनके शव को बाहर ले जाया गया था तो वहाँ खड़ी भीड़ ने उनके ऊपर थूका था और उसके साथ बदसलूकी की थी.

अमरीकी सैनिक हैरान थे

बार्डेनवर्पर लिखते हैं कि ये देख कर सद्दाम की अंतिम समय तक सुरक्षा करने वाले ये 12 सैनिक भौंचक्के रह गए थे.

इमेज कॉपीरइटROMEO GACAD

उनमें से एक शख़्स ने भीड़ से दो-दो हाथ करने की कोशिश भी की थी, लेकिन उनके साथियों ने उन्हें वापस खींच लिया था.

उन सैनिकों में से एक स्टीव हचिन्सन ने सद्दाम को फांसी दिए जाने के बाद अमरीकी सेना से इस्तीफ़ा दे दिया था.

हचिन्सन इस समय जॉर्जिया में बंदूकों और टैक्टिकल ट्रेनिंग का कारोबार करते हैं. उन्हें अभी भी इस बात का रंज है कि उन्हें उन इराकियों से न उलझने का आदेश दिया गया जो सद्दाम हुसैन के शव का अपमान कर रहे थे.

सद्दाम अपने अंतिम दिनों तक ये उम्मीद लगाए बैठे थे कि उन्हें फांसी नहीं होगी.

इमेज कॉपीरइटWILLImage captionलेखक और पूर्व अमरीकी सैनिक विल बार्डेनवर्पर

एक सैनिक एडम रोजरसन ने बार्डेनवर्पर को बताया था कि एक बार सद्दाम ने उनसे कहा था कि उनका किसी महिला से प्यार करने का दिल चाह रहा है. जब वो जेल से छूटेंगे तो एक बार फिर से शादी करेंगे.

30 दिसंबर, 2006 को सद्दाम हुसैन को तड़के तीन बजे जगाया गया.

उन्हें बताया गया कि उन्हें थोड़ी देर में फांसी दे दी जाएगी. ये सुनते ही सद्दाम के भीतर कुछ टूट गया. वो चुपचाप नहाए और अपने आप को फांसी के लिए तैयार किया.

इमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES

उस समय भी उनकी एक ही चिंता थी, 'क्या सुपर ट्वेल्व को नींद आई?'

अपनी फांसी से कुछ मिनटों पहले सद्दाम ने स्टीव हचिन्सन को अपनी जेल कोठरी के बाहर बुलाया और सीखचों से अपना हाथ बाहर निकाल कर अपनी 'रेमंड वील' कलाई घड़ी उन्हें सौंप दी.

जब हचिन्सन ने विरोध करना चाहा तो सद्दाम ने ज़बरदस्ती वो घड़ी उनके हाथ में पहना दी. हचिन्सन के जॉर्जिया के घर में एक सेफ़ के अंदर वो घड़ी अब भी टिक-टिक कर रही है.

Sunday, 21 May 2017

हिन्दू बेटी की इज्ज़त बचाने के लिए औरंगजेब ने अपने मुस्लिम सेनापति को दी थी सजा-ए-मौत

हिन्दू बेटी की इज्ज़त बचाने के लिए औरंगजेब ने अपने मुस्लिम सेनापति को दी थी सजा-ए-मौत

हजरत औरंगज़ेब काशी बनारस की एक ऐतिहासिक मस्जिद (धनेडा की मस्जिद) यह एक ऐसा इतिहास है जिसे पन्नो से तो हटा दिया गया है लेकिन निष्पक्ष इन्सान और हक़ परस्त लोगों के दिलो से (चाहे वो किसी भी कौम का इन्सान हो) मिटाया नहीं जा सकता, और क़यामत तक इंशा अल्लाह! मिटाया नहीं जा सकेगा…
हज़रत औरंगजेब आलमगीर की हुकूमत में काशी बनारस में एक पंडित की लड़की थी जिसका नाम शकुंतला था, उस लड़की को एक मुसलमान जाहिल सेनापति ने अपनी हवस का शिकार बनाना चाहा, और उसके बाप से कहा के तेरी बेटी को डोली में सजा कर मेरे महल पे 7 दिन में भेज देना…. पंडित ने यह बात अपनी बेटी से कही, उनके पास कोई रास्ता नहीं था और पंडित से बेटी ने कहा के 1 महीने का वक़्त ले लो कोई भी रास्ता निकल जायेगा…। 
पंडित ने सेनापति से जाकर कहा कि, “मेरे पास इतने पैसे नहीं हैं के मैं 7 दिन में सजाकर लड़की को भेज सकूँ, मुझे महीने का वक़्त दो.” सेनापति ने कहा “ठीक है! ठीक महीने के बाद भेज देना” पंडित ने अपनी लड़की से जाकर कहा “वक़्त मिल गया है अब?” लड़की ने मुग़ल सहजादे का लिबास पहना और अपनी सवारी को लेकर दिल्ली की तरफ़ निकल गई, कुछ दिनों के बाद दिल्ली पहुँची, वो दिन जुमे का दिन था, और जुमे के दिन हज़रत औरंगजेब आलमगीर नमाज़ के बाद जब मस्जिद से बहार निकलते तो लोग अपनी फरियाद एक चिट्ठी में लिख कर मस्जिद की सीढियों के दोनों तरफ़ खड़े रहते, और हज़रत औरंगजेब आलमगीर वो चिट्ठियाँ उनके हाथ से लेते जाते, और फिर कुछ दिनों में फैसला (इंसाफ) फरमाते, वो लड़की (शकुंतला) भी इस क़तार में जाकर खड़ी हो गयी, उसके चहरे पे नकाब था, और लड़के का लिबास (ड्रेस) पहना हुआ था, जब उसके हाथ से चिट्ठी लेने की बारी आई तब हज़रत औरंगजेब आलमगीर ने अपने हाथ पर एक कपडा डालकर उसके हाथ से चिट्ठी ली… तब वो बोली महाराज! मेरे साथ यह नाइंसाफी क्यों? सब लोगों से आपने सीधे तरीके से चिट्ठी ली और मेरे पास से हाथों पर कपडा रख कर ??? तब हज़रत औरंगजेब आलमगीर ने फ़रमाया के इस्लाम में ग़ैर मेहरम (पराई औरतों) को हाथ लगाना भी हराम है… और मैं जानता हूँ तू लड़का नहीं लड़की है… शकुंतला बादशाह के साथ कुछ दिन तक ठहरी, और अपनी फरियाद सुनाई, बादशाह हज़रत औरंगजेब आलमगीर ने उससे कहा “बेटी! तू लौट जा तेरी डोली सेनापति के महल पहुँचेगी अपने वक़्त पर…”
शकुंतला सोच में पड गयी के यह क्या? वो अपने घर लौटी और उसके बाप पंडित ने पूछा क्या हुआ बेटी? तो वो बोली एक ही रास्ता था मै हिन्दोस्तान के बादशाह के पास गयी थी, लेकिन उन्होंने भी ऐसा ही कहा कि डोली उठेगी, लेकिन मेरे दिल में एक उम्मीद की किरण है, वो ये है के मैं जितने दिन वहाँ रुकी बादशाह ने मुझे 15 बार बेटी कह कर पुकारा था… और एक बाप अपनी बेटी की इज्ज़त नीलाम नहीं होने देगा…।
फिर वह दिन आया जिस दिन शकुंतला की डोली सजधज के सेनापति के महल पहुँची, सेनापति ने डोली देख के अपनी अय्याशी की ख़ुशी फकीरों को पैसे लुटाना शुरू किया…। जब पैसे लुटा रहा था तब एक कम्बल-पोश फ़क़ीर जिसने अपने चेहरे पे कम्बल ओढ रखी थी… उसने कहा “मैं ऐसा-वैसा फकीर नहीं हूँ, मेरे हाथ में पैसे दे”, उसने हाथ में पैसे दिए और उन्होंने अपने मुह से कम्बल हटा तो सेनापति देखकर हक्का बक्का रह गया क्योंकि उस कंबल में कोई फ़क़ीर नहीं बल्कि हज़रत औरंगजेब आलमगीर खुद थे…। 
उन्होंने कहा के तेरा एक पंडित की लड़की की इज्ज़त पे हाथ डालना मुसलमान हुकूमत पे दाग लगा सकता है, और आप हज़रत औरंगजेब आलमगीर ने इंसाफ फ़रमाया 4 हाथी मंगवाकर सेनापति के दोनों हाथ और पैर बाँध कर अलग अलग दिशा में हाथियों को दौड़ा दिया गया… और सेनापति को चीर दिया गया… फिर आपने पंडित के घर पर एक चबूतरा था उस चबूतरे के पास दो रकात नमाज़ नफिल शुक्राने की अदा की, और दुआ कि के, “ऐ अल्लाह! मैं तेरा शुक्रगुजार हूँ, के तूने मुझे एक ग़ैर इस्लामिक लड़की की इज्ज़त बचाने के लिए, इंसाफ करने के लिए चुना…। फिर हज़रत औरंगजेब आलमगीर ने कहा “बेटी! ग्लास पानी लाना!” लड़की पानी लेकर आई, तब आपने फ़रमाया कि:“जिस दिन दिल्ली में मैंने तेरी फरियाद सुनी थी उस दिन से मैंने क़सम खायी थी के जब तक तेरे साथ इंसाफ नहीं होगा पानी नहीं पिऊंगा…।”तब शकुंतला के बाप (पंडित जी) और काशी बनारस के दूसरे हिन्दू भाइयों ने उस चबूतरे के पास एक मस्जिद तामीर की, जिसका नाम “धनेडा की मस्जिद” रखा गया… और पंडितों ने ऐलान किया के ये बादशाह औरंगजेब आलमगीर के इंसाफ की ख़ुशी में हमारी तरफ़ से इनाम है… और सेनापति को जो सजा दी गई वो इंसाफ़ एक सोने की तख़्त पर लिखा गया था जो आज भी धनेडा की मस्जिद में मौजुद है…।अल्लाह हमे भी सच्चाई पर चलने की तोफिक अता फ़रमाए…।

– मेहरबान अंसारी